Monday, April 13, 2015

mare shahar ki galiya


ये मेरा शहर है,
मुझ को यहीं रहना भी है , लेकिन . . . 
मुझे इस शहर की दो तीन गलियों को भूलना !
की इन गलियों दे वास्ता हैं, 
कुछ मग़मूम सी यादे ,
मगर मुश्किल यही तो है,
की मैं जिसे सिमट भी जाऊ,
वही गलियां मेरे हर रस्ते मं आ निकलती है!
मगर   कैसे भूलना है ,
नहीं कुछ सूझता मुझ को ,
किसी से पूछना होगा , 
ये अंदेशा भी है लेकिन ,
के मैं जिस से भी पूछूंगा ,
वो मुझ को न दे पायेगा,
मुनासिब मशवरा कोई,
के इन गलिओं के जादू  का ,
किसी को इल्म ही कब हे 

No comments:

Post a Comment

मै अश्क़ हूँ मेरी आँख तुम हो... मै दिल हूँ मेरी धडकन तुम हो... मै जिस्म हूँ मेरी रूह तुम हो... मै जिंदा हूँ मेरी ज़िन्दगी तुम हो... मै साया ...